करवा चौथ का व्रत विवाहित महिलाएं अपने पति की सुरक्षा और लंबी उम्र के लिए सूर्योदय से चंद्रोदय तक उपवास रखकर करती हैं। हर साल कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दिन करवा चौथ का व्रत रखा जाता है। चौथ का अर्थ है – चतुर्थी तिथि है और करवा करवा मिट्टी का एक छोटा सा विशेष प्रकार का घड़ा है। उत्तर भारत में इस व्रत का परंपरा प्रचलन अधिक है।
यह व्रत भारतीय परम्परा का एक अटूट हिस्सा है। संस्कृत के ग्रन्थों में, इस त्योहार को ‘करका चतुर्थी’ के रूप में संबोधित किया गया है। पति तथा पत्नी के सम्बन्ध पर आधारित यह व्रत परंपरागत रूप से उत्तर भारत के राज्यों में जैसे- दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, जम्मू, राजस्थान, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में मनाया जाता है। इसे आंध्र प्रदेश में अतला तड्डे के रूप में मनाया जाता है।
इस लेख में, हम इस व्रत की तिथि और महत्व के विषय में जानेंगे।
करवा चौथ का व्रत क्यों रखा जाता है ?
विवाहित महिलाएं अपने सुहाग (पति) की लंबी आयु के लिए इस दिन व्रत रखती हैं। ऐसा माना जाता है कि जो महिलाएं करवा चौथ का व्रत रखती हैं और सच्चे मन से भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा करती हैं, उन्हें अखंड सौभाग्यवती होने का फल मिलता है।
करवा चौथ का व्रत कब रखा जाता है ?
प्रतिवर्ष करवा चौथ का व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है। यह व्रत नवरात्रि के बाद तथा दीवाल से पहले आता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं यह व्रत रखती है। यह विवाहित महिलाओं का सुंदर सुहाग पर्व है। इस व्रत में सास अपनी बहू को सरगी देती है।
2022 में, करवा चौथ का व्रत कब है ?
इस साल, 2022 में, कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 13 अक्टूबर की रात्रि 1 बजकर 59 मिनट से आरम्भ होगी तथा 14 अक्टूबर को सुबह 03 बजकर 08 मिनट पर समाप्त होगी।
हिंदू धर्म में उदया तिथि सर्वमान्य तिथि होती है। ऐसी परिस्थिति में, करवा चौथ का व्रत 13 अक्टूबर, 2022 को रखा जाएगा।
करवा चौथ शुभ मुहूर्त क्या है?
13 अक्टूबर, 2022 को सुबह 11:21बजे से लेकर दोपहर 12:07 बजे तक अभिजीत मुहूर्त रहेगा।
सायं 04:08 बजे से लेकर सायं 05:50 बजे तक अमृत काल मुहूर्त रहेगा।
करवा चौथ के दिन पूजा के लिए शुभ मुहूर्त सायं 05: 46 बजे से सायं 06:50 बजे तक रहेगा।
करवा चौथ पूजा विधि क्या है?
व्रत रखने वाली महिलाएं, करवा चौथ के दिन सुबह सूर्योदय से पहले स्नान करती हैं। इसके बाद घर के मंदिर में देवी-देवताओं की पूजा करती हैं और निर्जला व्रत का संकल्प लेती हैं। शाम के समय पुनः स्नान करती हैं और इसके बाद मिट्टी की वेदी पर शिव पार्वती की स्थापना करती हैं। इसके बाद, वे मां पार्वती को चुनरी चढ़ाकर 16 श्रृंगार की सामग्री अर्पित करती हैं। पूजा के दौरान करवा चौथ के व्रत की कथा सुनती हैं और सुनाती हैं।
इस दिन घर की सभी महिलाएं एक साथ पूजा करती हैं। शाम को चंद्रोदय के समय छलनी से चंद्र देव का दर्शन करती हैं और साथ ही अपने पति का भी दर्शन करती हैं।
चंद्रमा को अर्घ्य देने का मंत्र कौनसा है-
चंद्रमा को अर्घ्य देने का मंत्र निम्नलिखित है-
| करकं क्षीरसंपूर्णा तोयपूर्णमयापि वा। | ||
| ददामि रत्नसंयुक्तं चिरंजीवतु मे पतिः॥ | ||
| इति मन्त्रेण करकान्प्रदद्याद्विजसत्तमे। | ||
| सुवासिनीभ्यो दद्याच्च आदद्यात्ताभ्य एववा।। | ||
| एवं व्रतंया कुरूते नारी सौभाग्य काम्यया। | ||
| सौभाग्यं पुत्रपौत्रादि लभते सुस्थिरां श्रियम्।। |
करवा चौथ व्रत का पारण क्या है?
इस दिन, महिलाएं शाम को चंद्रोदय होने पर चांद को अर्घ्य देती हैं। इसके बाद, वे पति के हाथों से पानी पीकर व्रत को तोड़ती हैं। इसके बाद, वे करवा चौथ के प्रसाद के साथ मीठा भोजन करके व्रत का पारण करती हैं। पूजा के बाद अपने घर के सभी बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद लेती हैं। इस दिन लहसुन-प्याज आदि तामसिक भोजन का सेवन नहीं किया जाता।
करवा चौथ के व्रत का इतिहास क्या है?
करवा चौथ के व्रत की परम्परा महाभारत काल से भी पहले से चली आ रही है। संस्कृत के प्राचीन ग्रन्थों में, इस त्योहार का ‘करका चतुर्थी’ के रूप में उल्लेख मिलता है।
इस व्रत के संबंध में अनेक लोककथाएं प्रचलित हैं। शंकरजी ने माता पार्वती को इस व्रत के बारे में बताया था। इस व्रत को करने से महिलाएं हर आने वाले संकट से अपने पति की रक्षा करती हैं।
महाभारत काल में द्रौपदी ने अपने पति अर्जुन के लिए इस व्रत को किया था। जब अर्जुन तपस्या करने के लिए नीलगिरि नामक पर्वत पर चला गया था, तब द्रौपदी उसके लिए बहुत चिन्तित थी। एकदिन द्रौपदी ने अपनी चिन्ता के बारे में भगवान् श्रीकृष्ण को बताया। श्रीकृष्ण ने उसे कर्कशा चतुर्थी (करवा चौथ) का व्रत करने की सलाह दी। यह परंपरा तब से चल रही है।
एक अन्य परंपरा के अनुसार, इस व्रत का नाम करवा नामक एक गुणी महिला के नाम पर रखा गया है। इस परम्परा के अनुसार, करवा नाम की महिला ने यमराज से अपने पति के प्राणों को बचाया था। तभी से वह महिला ‘करवा माता’ कहलाने लगी।
आधुनिक विद्वानों की इस व्रत की उत्पत्ति के विषय में निम्नलिखित विचार हैं-
1. करवा चौथ ज्यादातर उत्तरी भारत में मनाया जाता है। इसकी एक परिकल्पना यह है कि पुरुष सैनिक अक्सर सैन्य अभियान पर दूर-दराज के स्थानों पर जाया करते थे। वे अपनी पत्नियों और बच्चों को घर पर छोड़ देते थे। उनकी पत्नियां अक्सर उनकी सुरक्षित वापसी के लिए प्रार्थना तथा व्रत आदि करती थीं।
2. यह त्योहार गेहूं की बुवाई के समय अर्थात् रबी फसल चक्र की शुरुआत के साथ भी मेल खाता है। बड़े मिट्टी के बर्तन जिनमें गेहूँ जमा किया जाता है, उन्हें भी करवा कहा जाता है। अतः हो सकता है कि यह उपवास मुख्य रूप से गेहूं खाने वाले इस उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में अच्छी फसल के लिए प्रार्थना के रूप में शुरू हुआ हो।
करवा चौथ की पौराणिक और लोकप्रिय लोककथा क्या है?
करवा चौथ के व्रत को लेकर कई लोककथाएं प्रचलित हैं। उनमें से कुछ प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय लोककथाएं निम्नलिखित हैं –
द्रौपदी की कहानी
इस व्रत की परम्परा महाभारत काल से पहले से चली आ रही है। कहा जाता है कि द्रौपदी ने भी यह व्रत रखा था। एक बार अर्जुन तपस्या के लिए नीलगिरी पर्वत पर गए थे। द्रौपदी को कई दिनों तक अर्जुन का कोई समाचार न मिला। उनकी अनुपस्थिति में, बाकी पांडवों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। इससे द्रोपदी को बहुत चिंता हुई। हताशा में, उन्होंने भगवान कृष्ण का ध्यान किया और मदद मांगी।
भगवान कृष्ण ने कहा – एक बार माता पार्वती ने इसी तरह की परिस्थितियों में भगवान शंकर से ऐसा ही एक प्रश्न पूछा था और मार्गदर्शन मांगा था। तब शंकरजी ने माता पार्वती को करवा चौथ का व्रत बताया था। भगवान शंकर ने कहा था कि इस व्रत का विधिपूर्वक पालन करके महिलाएं अपने पति को हर आने वाले संकट से बचा सकती हैं।
इस कथा के कुछ कथनों में शिवजी महाराज माता पार्वती को करवा चौथ व्रत का वर्णन करने के लिए वीरवती की कथा सुनाते हैं। द्रौपदी ने निर्देशों का पालन किया और अपने सभी अनुष्ठानों के साथ व्रत का पालन किया। इसका परिणाम यह हुआ कि पांडव अपनी समस्याओं को दूर करने में सक्षम हुए।
रानी वीरवती की कहानी
वीरवती नाम की एक सुंदर रानी थी। वह सात भाइयों की इकलौती बहन थी। उसके सातों सातों भाई उससे बहुत प्यार करते थे। वे उसे कष्ट में बिल्कुल देख नहीं सकते थे। युवती होने पर एक सुयोग्य वर के साथ उसका विवाह कर दिया गया।
विवाह होने के बाद, वीरवती ने अपना पहला ‘करवा चौथ’ अपने माता-पिता के घर पर मनाया। उसने सूर्योदय के बाद ‘करवा चौथ’ का एक सख्त उपवास शुरू किया। ‘’करवा चौथ’ का व्रत सूर्योदय से चंद्रोदय तक रहता है, लेकिन शाम तक, उसे गंभीर प्यास और भूख लग गयी थी। वह चंद्रोदय का बेसब्री से इंतजार कर रही थी।
उसके सातों सातों भाई उससे बहुत प्यार करते थे। उन्होंन अपनी बहन को इस तरह के संकट में नहीं देखा था।
क्योंकि वे उसे कष्ट में बिल्कुल देखना नहीं चाहते थे, अतः उन्होंन एक पीपल के पेड़ में एक दर्पण इस तरह बनाया कि, जिससे ऐसा लगे कि जैसे चाँद निकल आया हो।
बहन ने इसे चंद्रमा समझ लिया और व्रत का पारण किया। जैसे ही उसने भोजन का पहला निवाला लिया, उसे छींक आई। अपने दूसरे निवाले में उसे बाल मिले। तीसरे के बाद उसे पता चला कि उसके पति राजा की मृत्यु हो गई है।
इस घटना से उसका दिल टूट गया। वह रात भर रोती रही। फिर, एक देवी उसके सामने प्रकट हुई। उस देवी ने पूछा कि वह क्यों रो रही है।
जब रानी ने अपनी व्यथा उस देवी को बताई, तो देवी ने खुलासा किया कि कैसे उनके भाइयों ने उन्हें धोखा दिया था। उस देवी ने उन्हें पूरी भक्ति के साथ करवा चौथ का व्रत दोहराने का निर्देश दिया।
जब वीरवती ने अपना उपवास फिर से किया, तो यम को उसके पति को पुनर्जीवित करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
इस कहानी का एक अन्य रूप भी मिलता है इस के अनुसार, भाई एक पहाड़ के पीछे एक विशाल आग की व्यवस्था करते हैं और अपनी बहन को यह विश्वास दिलाते हैं कि चमक चंद्रमा की है। इसे वह चंद्रमा समझ लेती है और अपना उपवास तोड़ लेती है। इसके बाद समाचार मिलता है कि उसके पति की मृत्यु हो गई है। वह तुरंत अपने पति के घर की ओर दौड़ना शुरू कर देती है। वह कुछ दूर तक जाती है, और शिव-पार्वती ने उसे रोक लिया। पार्वती ने उसके भाइयों द्वारा किये गये छल का खुलासा किया।
पत्नि पार्वती से मा-याचना करती है। पार्वती उस पत्नी पर दया करती हैं और उसके मृत पति को जीवनदान दे देती हैं। उसका पति फिर से जीवित हो जाता है और वे फिर से मिल जाते हैं।
करवा माता की कहानी
एक अन्य परंपरा के अनुसार, करवा चौथ का नाम एक गुणी महिला के नाम पर रखा गया है। इस कथा के अनुसार, करवा नाम की एक गुणी महिला थी। वह अपने पति के प्रति अत्यधिक समर्पित थी। उनके प्रति उनके गहन प्रेम और समर्पण ने उन्हें शक्ति (आध्यात्मिक शक्ति) दी। वह अपने पति के साथ नदी के किनारे एक गांव में रहती थी।
एक दिन उसका पति नदी में नहा रहा था। तभी एक मगरमच्छ ने उसका पैर पकड़ लिया। वह व्यक्ति अपनी पत्नी को करवा-करवा कहकर पुकारने लगा। उसकी आवाज सुनकर उसकी पत्नी करवा भागकर आई और आकर मगरमच्छ को कच्चे धागे से बांध दिया।
मगरमच्छ को कच्चे धागे से बांधने के बाद वह महिला यमराज के पास पहुंच गई। वह यमराज को कहने लगी, “हे भगवन्! मगरमच्छ ने मेरे पति की टांग पकड़ ली है। उस मगरमच्छ को पकड़कर मेरे पति की टांग पकड़ने के अपराध में नरक में ले जाओ।”
यमराज ने कहा, “लेकिन मगर की आयु अभी शेष है, इसलिए मैं उसे मार नहीं सकता।” इस पर करवा ने कहा, “यदि आप ऐसा नहीं करोगे, तो मैं शाप देकर तुझे नष्ट कर दूंगी।”
यह सुनकर यमराज डर गया और उसने मगरमच्छ को यमपुरी को भेज दिया दिया और करवा के पति को दीर्घायु होने का दे आशीर्वाद दिया। तभी से वह महिला ‘करवा माता’ कहलाने लगी।
सरगी क्या है?
सरगी भोजन की एक थाली है जिसमें कुछ खाद्य पदार्थ होते हैं। यह व्रत रखने वाली महिला को शगुन के रूप में मिलती है। दिन भर सूर्योदय से लेकर चन्द्रोदय तक उपवास रखा जाता है और फिर चंद्रमा की पूजा के बाद ही खाया जाता है।
यह अनुष्ठान अक्सर पंजाब प्रांत में किया जाता है। करवा चौथ के दिन, जब कोई भी महिला उपवास रखती है, तो उस महिला की सास उसे सरगी बनाकर देती है।
चूंकि व्रत की शुरुआत सरगी खाकर की जाती है इसलिए थाली में ऐसी चीजें होती हैं जिन्हें खाने से भूख-प्यास कम लगती है और दिन भर ऊर्जा बनी रहती है। अतः थाली में सूखे मेवे और फल आदि होते हैं।
बहू अपने व्रत की शुरुआत अपनी सास द्वारा दी गई सरगी से करती है। यदि सास उसके पास में नहीं होती है, वह वह सभी चीजों के लिये बहू को पैसे भेज देती है।
इस सरगी में कपड़े, शहद, फल, मेवा, नारियल आदि रखे जाते हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में इस त्योहार को मनाने का अलग ही मजा है।
करवा चौथ के पूजन लिए आवश्यक सामग्री क्या है?
करवा चौथ के पूजन लिए कुछ आवश्यक सामग्री की सूची निम्नलिखित हैं –
| चंदन | दही | महावर | दीपक | शकर का बूरा |
| शहद | मिठाई | कंघा | रुई | लकड़ी का आसन |
| अगरबत्ती | गंगाजल | बिंदी | कपूर | अक्षत (चावल) |
| पुष्प | कुंकुम | चुनरी | गेहूं | आठ पूरियों की अठावरी |
| मेहंदी | चलनी | चूड़ी | हलुआ | पानी का लोटा |
| शकर | सिंदूर | बिछुआ | हल्दी | मिट्टी का करवा और ढक्कन |
| कच्चा दूध | शुद्ध घी | पीली मिट्टी (गौरी बनाने के लिए) |
करवा चौथ के विभिन्न रीति रिवाज
इस व्रत को करने वाली महिलाएं सामूहिक रूप से एक घेरे में बैठती हैं। करवा चौथ की पूजा करते हुए फेरी लगाती हैं और गीत गाती हुई अपनी- अपनी थालियों को घेरे में घुमाती हैं।
करवा चौथ की पूजा करने के बाद, व्रत रखने वाली महिलाएं, सूर्य को जल अर्पित करती (अर्क) हैं।
महिलाएं कुछ दिन पहले से ही करवा चौथ की तैयारी शुरू कर देती हैं, जैसे कि करवा, दिया आदि पूजा की वस्तुएं, श्रृंगार, गहने, मठी, मेहंदी और सजाई गई पूजा थाली आदि खरीदना। स्थानीय बाज़ारों में, दुकानदार अपने करवा चौथ से संबंधित उत्पादों की प्रदर्शनी लगाते हैं। इस समय बाज़ारों में उत्सव का सा नज़ारा होता है।
उत्तर प्रदेश में उत्सव की पूर्व संध्या पर, व्रत रखने वाली महिलाएं दूध में चीनी के साथ फेनी (फीणी) खाती हैं। ऐसा कहा जाता है कि इससे उन्हें अगले दिन पानी के बिना रहने में मदद मिलती है।
पंजाब की महिलाएं व्रत के दिन सूर्योदय से ठीक पहले खाने-पीने के लिए उठती हैं। पंजाब में, सरगी का बहुत अधिक महत्व है । इसमें हमेशा फेनिया शामिल होता है। व्रत रखने वाली महिला को उसकी सास द्वारा सरगी भेजना या देना एक पारंपरा है। यदि वह अपनी सास के साथ रहती है, तो सुबह का भोजन सास द्वारा तैयार किया जाता है।
इस अवसर पर, उपवास करने वाली महिलाएं करवा चौथ के विशेष कपड़े जैसे कि पारंपरिक साड़ी अथवा लहंगे आदि पहनना पसंद करती हैं। कुछ क्षेत्रों में महिलाएं अपने राज्यों के पारंपरिक परिधान पहनती हैं।
उपवास प्रातः बहुत जल्दी (भोर काल से) शुरू हो जाता है। उपवास रखने वाली महिलाएं निर्जला व्रत करती हैं अर्थात् पूरे दिन भोजन नहीं करती हैं। हिंदू धर्म में, विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए व्रत (उपवास) के साथ कई तरह के अन्य अनुष्ठान भी करती हैं। संत गरीबदास जी महाराज कहते हैं:
कहे जो करूवा चौथि कहानी| तास गदहरी निश्चय जानी ||
कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में, उपहारों का आदान-प्रदान होता है। माता-पिता अक्सर अपनी विवाहित बेटियों और उनके बच्चों को उपहार भेजते हैं।
उत्तर प्रदेश में, एक पुजारी या परिवार की बुजुर्ग महिला वीरवती आदि की लोककथा सुनाती है। व्रत करने वाली महिलाएं माता गौरी, गणेश और शंकर की मूर्तियों को मिट्टी से बनाती हैं और उन्हें रंगीन और चमकीले कपड़े और आभूषणों से सजाती हैं। सात बार करवा का आदान-प्रदान करते हुए, वे गाते हैं –
… सदा सुहागन करवा लो, पति की प्यारी करवा लो, सात भाईयों के बहन कर्वे लो, बात करनी करवा लो, सास की प्यारी करवा लो…
इसके बाद, उपवास करने वाली महिलाएं मूर्तियों को बायना (हलवा, पूरी, नमकीन मठरी, मीठी मठरी, आदि) की पेशकश करती हैं और अपनी सास या ननद को सौंप देती हैं।
इस प्रकार फेरा समारोह संपन्न होने पर, महिलाएं चंद्रमा के उगने का इंतजार कर रही हैं। जब चंद्रमा दिखाई देने लगता है, तो क्षेत्र और समुदाय के आधार पर चंद्रमा या उसके प्रतिबिंब को देखने की प्रथा है। क्षेत्र और समुदाय के अनुसार, उपवास करने वाली महिला, पानी से भरे बर्तन में अथवा छलनी के माध्यम से अथवा कपड़े के दुपट्टे के माध्यम से चंद्रमा या उसके प्रतिबिंब को देखती हैं।
फिर, महिला अपने पति के चेहरे को छलनी में से देखती है। चंद्र देवता का आशीर्वाद पाने के लिए उसको पानी (अर्क) चढ़ाया जाता है। कुछ क्षेत्रों में, महिला अपने पति के जीवन के लिए एक संक्षिप्त प्रार्थना कहती है। ऐसा माना जाता है कि इस अवसर पर, महिला अपने उपवास से आध्यात्मिक रूप से मजबूत हो जाती है तथा वह सफलतापूर्वक मृत्यु का सामना कर सकती है।
राजस्थान में, महिलाएं कहती हैं, “सोने के हार और मोतियों के कंगन की तरह, मेरा सुहाग हमेशा चमकता रहे चाँद की तरह।”
उसके बाद उसका पति थाली से पानी लेता है और अपनी पत्नी को पिलाता है। दिन के दौरान पानी का पहला घूंट पीने से अब उपवास का पारण हो जाता है। इसके बाद, महिला पूरा भोजन कर सकती है।
सार:-
संक्षिप्त रूप में कहा जाए तो यह व्रत रखने वा महिलाएं निम्नलिखित कार्य करती हैं-
- सुबह सूर्योदय से पहले उठ जाती हैं । सरगी के रूप में मिला हुआ भोजन कती हैं, पानी पीती हैं और भगवान की पूजा करके निर्जला व्रत का संकल्प लेती हैं।
- करवा चौथ में महिलाएं पूरे दिन जल-अन्न कुछ ग्रहण नहीं करतीं फिर शाम के समय चांद को देखने के बाद दर्शन कर व्रत खोलती हैं।
- पूजा के लिए शाम के समय एक मिट्टी की वेदी पर सभी देवताओं की स्थापना कर इसमें करवे रखती हैं।
- एक थाली में धूप, दीप, चंदन, रोली, सिन्दूर रखें और घी का दीपक जलाती हैं।
- चांद निकलने के एक घंटे पहले पूजा की तैयारी शुरू कर देती हैं।
- इस दिन महिलाएं एक साथ मिलकर पूजा करती हैं।
- पूजन के समय करवा चौथ कथा जरूर सुनती या सुनाती हैं।
- चांद को छलनी से देखने के बाद अर्घ्य देकर चंद्रमा की पूजा करती हैं।
- चांद को देखने के बाद पति के हाथ से जल पीकर व्रत खोलती हैं।
- इस दिन बहुएं अपनी सास को थाली में मिठाई, फल, मेवे, रुपए आदि देकर उनसे सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद लेती हैं।
करवा चौथ का महत्त्व
करवा चौथ को लेकर सुहागन महिलाओं में काफी उत्साह रहता है। सुहागिन महिलाओं के लिए यह दिन बेहद ही खास होता है। मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को करने से शादीशुदा जीवन सुखमय होता है और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
सन्दर्भ- इस लेख के तथ्य विभिन्न संस्कृत एवं हिन्दी के ग्रन्थ, समाज में प्रचलित परम्पराओं, पौराणिक कथाओं, wikipedia , webdunia एवं zeenews.india.com से लिए गए हैं
FAQ
प्रश्न-1. इस साल करवा चौथ का व्रत कब है?
करवा चौथ का व्रत हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है। इस बार यह व्रत 13 अक्टूबर 2022 को रखा जाएगा। इस बार करवा चौथ पर बेहद ही शुभ संयोग भी बन रहा है।
प्रश्न-2. महिलाएं मिट्टी का करवा क्यों लेती हैं?
महिलाएं मिट्टी का करवा लेती हैं क्योंकि इसका निस्तारण किया जा सकता है। अगर मिट्टी का करवा नहीं है तो कुछ महिलाएं स्टील के लोटे का भी इस्तेमाल करती हैं।
