‘नीतिनवनीतम्’ नामक पाठ कक्षा—8वीं के लिए निर्धारित संस्कृत की पाठ्य पुस्तक रुचिरा भाग—3 में एक नीतिपरक अध्याय है। प्रस्तुत पाठ में ‘मनुस्मृति’ के कुछ श्लोकों का संकलन है। ये श्लोक सदाचार सीखने और सिखाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है|
इस पाठ में माता, पिता तथा गुरुजनों का आदर और सेवा करने वाले मनुष्य को मिलने वाले लाभ का वर्णन किया गया है|
इसके अतिरिक्त कुछ शिष्टाचारों का उल्लेख भी किया गया है, जैसे— सुख-दुःख में समान रहना, अंतरात्मा को आनंदित करने वाले काम करना एवं इसके विपरीत कामों का त्याग करना, सम्यक विचारोपरांत तथा सत्यमार्ग का अनुसरण करते हुए कार्य करना इत्यादि।
आइए अब हम इस अध्याय के श्लोकों का क्रमश: अध्ययन करते हैं—
श्लोक:- 1. अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः|
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्||1||
अन्वय:— अभिवादनशीलस्य नित्यं (च) वृद्धोपसेविनः, तस्य आयुर्विद्या यशो बलम् (च) चत्वारि वर्धन्ते।
शब्दार्थ:- अभिवादनशीलस्य = प्रणाम करने की आदत वाले का,
नित्यं = प्रतिदिन,
वृद्धोपसेविनः = बड़े-बुजर्गों की सेवा करने वाले की,
चत्वारि = चार,
तस्य = उसकी ,
वर्धन्ते = बढ़ती हैं
व्याकरणम्— वृद्धोपसेविनः = वृद्ध: + उपसेविनः,
आयुर्विद्या = आयु: + विद्या।
सरलार्थ:— प्रणाम करने की आदत वाले तथा प्रतिदिन बड़े-बुजर्गों की सेवा करने वाले मनुष्य की चार चीजें बढ़ती है— आयु, विद्या, यश और बल।
श्लोक:- 2. यं मातपित्रौ क्लेशं सहेते सम्भवे नृणाम्|
न तस्य निष्कृतिः शक्या कर्तुं वर्षशतैरपि||2||
अन्वय:— नृणाम् सम्भवे मातपित्रौ यं क्लेशं सहेते, तस्य निष्कृति: वर्षशतैरपि कर्तुं न शक्या।
शब्दार्थ:— नृणाम् = मनुष्यों को,
सम्भवे = उत्पन्न करने में जन्म देने में,
मातपित्रौ = माता और पिता,
यं = जिस (को),
क्लेशं = कष्ट (पीड़ा) को,
सहेते = सहन करते हैं,
तस्य = उसका,
निष्कृति: = बदला,
वर्षशतैरपि = सौ वर्षों तक भी,
कर्तुं = करने में,
न = नहीं,
शक्या = समर्थ होते हैं।
निष्कृति: कर्तुं न शक्या = बदला चुकाया नहीं जा सकता।
व्याकरणम्— वर्षशतैरपि = वर्षशतै: + अपि।
कर्तुं = कृ + तुमुन्। (कृ धातु: तथा तुमुन् प्रत्यय:)
सरलार्थ:— मनुष्यों को उत्पन्न करने में (जन्म देने में) माता-पिता जिस कष्ट (पीड़ा) को सहन करते हैं, उसका बदला सौ वर्षों तक भी चुकाया नहीं जा सकता।
श्लोक:- 3. तयोर्नित्यं प्रियं कुर्यादाचार्यस्य च सर्वदा|
तेष्वेव त्रिषु तुष्टेष तपः सर्वं समाप्यते||3||
अन्वय:— तयो: (मातपितरयो:) आचार्यस्य च सर्वदा नित्यं प्रियं कुर्यात्, तेषु त्रिषु तुष्टेषु एव सर्वं तप: समाप्यते।
शब्दार्थ:— तयो: = उन दोनों का (माता पिता का),
आचार्यस्य = गुरु का,
च = और,
सर्वदा = हमेशा,
नित्यं = प्रतिदिन,
प्रियं = प्रिय,
कुर्यात् = करना चाहिए,
तेषु = उनमें,
त्रिषु = तीनों में,
तुष्टेषु = सन्तुष्टों में,
एव = ही
सर्वं = सारा,
तप: = तपस्या
समाप्यते= समाप्त हो जाती है।
व्याकरणम्— तयोर्नित्यं = तयो: + नित्यं,
कुर्यादाचार्यस्य = कुर्यात् + आचार्यस्य,
तेष्वेव = तेषु + एव।
सरलार्थ:— उन दोनों (माता और पिता) और गुरु का हमेशा प्रतिदिन प्रिय करना चाहिए। उन तीनों के ही संतुष्ट हो जाने पर सारी तपस्या समाप्त हो जाती है अर्थात् सारी तपस्या सार्थक हो जाती है।
श्लोक:- 4. सर्व परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्|
एतदि्वद्यात्समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः||4||
अन्वय:— परवशं सर्वं दु:खम् आत्मवशं (च) सर्वं सुखम्, एतत् समासेन सुखदुःखयोः लक्षणं विद्यात्।
शब्दार्थ:— परवशं = परतन्त्रता में
सर्वं = सारा
दु:खं = दु:ख
आत्मवशम् = स्वतन्त्रता में
सुखम् = सुख
एतत् = यह
समासेन = संक्षेप में
सुखदुःखयोः = सुख और दु:ख का
लक्षणं = लक्षण
विद्यात् = समझना चाहिए।
व्याकरणम् — सर्वमात्मवशं = सर्वम् + आत्मवशम्,
एतदि्वद्यात्समासेन = एतत् + विद्यात् + समासेन।
सरलार्थ:— परतन्त्रता में सारा दु:ख है तथा स्वतन्त्रता में सारा सुख है। यह संक्षेप में सुख और दु:ख का लक्षण समझना चाहिए।
श्लोक:- 5. यत्कर्म कुर्वतोSस्य स्यात्परितोषोSन्तरात्मनः|
तत्प्रयत्नेन कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत्||5||
अन्वय:— यत् कर्म कुर्वत: अस्य अन्तरात्मन: परितोष: स्यात्, तत् (कर्म) प्रयत्नेन कुर्वीत। (तस्य) विपरीतं तु वर्जयेत्।
शब्दार्थ:— यत् = जिस,
कर्म = काम को
कुर्वत: = करते हुए (करने से)
अस्य = इसका
अन्तरात्मन: = अन्तरात्मा का (ह्दय का),
परितोष: = सन्तोष
स्यात् = होवे,
तत् = उसको,
प्रयत्नेन = कोशिश करके,
कुर्वीत = करना चाहिए,
विपरीतं = उल्टे (काम) को
तु = तो
वर्जयेत् = त्याग देना चाहिए।
व्याकरणम्:— कुर्वतोSस्य = कुर्वत: + अस्य,
स्यात्परितोषोSन्तरात्मनः = स्यात् + परितोष: + अन्तरात्मनः।
सरलार्थ:— जिस काम को करने से अन्तरात्मा का संतोष होता हो, उस काम को कोशिश करके करना चाहिए।उससे उल्टे काम को त्याग देना चाहिए, अर्थात् जिस काम को करने से अन्तरात्मा खुश नहीं होती है, उस काम को छोड़ देना चाहिए।
श्लोक:- 6. दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्|
सत्यपूतां वदेद्वाचं मनः पूतं समाचरेत्||6||
अन्वय:— दृष्टिपूतं पादं न्यसेत्, वस्त्रपूतं जलं पिबेत्, सत्यपूतां वाचं वदेत्, मनः पूतं समाचरेत्।
शब्दार्थ:— दृष्टिपूतं = अच्छी तरह देखकर,
पादं = पैर (कदम) को
न्यसेत् = रखना चाहिए,
वस्त्रपूतं = कपड़े से छानकर,
जलं = पानी को
पिबेत् = पीना चाहिए,
सत्यपूतां = सत्य से पवित्र,
वाचं = वाणी को,
वदेत् = बोलना चाहिए,
मनः = मन से,
पूतं = पवित्र
समाचरेत् = आचरण करना चाहिए।
व्याकरणम्— वदेद्वाचं = वदेत् + वाचम्।
सरलार्थ:— अच्छी तरह देखकर कदम रखना चाहिए। कपड़े से छानकर पानी पीना चाहिए। सत्य से पवित्र वाणी बोलनी चाहिए। मन से पवित्र आचरण करना चाहिए।
अभ्यासस्य प्रश्नोत्तराणि (अभ्यास के प्रश्नोत्तर)
प्रश्न:—1. अधोलिखितानि प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखत–
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक पद में लिखिए—
(क) नृणां संभवे कौ क्लेशं सहेते?
उत्तरम्— मातापितरौ।
(ख) कीदृशं जलं पिबेत्?
उत्तरम्— वस्त्रपूतम्।
(ग) नीतिनवनीतम् पाठः कस्मात् ग्रन्थात् सङ्कलित:?
उत्तरम्— मनुस्मृतेः।
(घ) कीदृशीं वाचं वदेत्?
उत्तरम्— सत्यपूताम्।
(ङ) दुःखं किं भवति?
उत्तरम्— परवशम्।
(छ) आत्मवशं किं भवति?
उत्तरम्— सुखम्।
(ज) कीदृशं कर्म समाचरेत्?
उत्तरम्— येन अन्तरात्मनः परितोषः भवेत्।
प्रश्न:—2. अधोलिखितानि प्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत–
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर पूरे वाक्य में लिखिए—
(क) पाठेऽस्मिन् सुखदुःखयों किं लक्षणम् उक्तम्?
उत्तरम्— सर्वं परवशं भवति दुःखम्, आत्मवशं च भवति सुखम्।
(ख) वर्षशतैः अपि कस्य निष्कृतिः कर्तुं न शक्या?
उत्तरम्— नृणां सम्भवे मातापितरौ यं क्लेशं सहेते न तस्य वर्षशतैः निष्कृतिः शक्या।
(ग) “त्रिषु तुष्टेषु तपः समाप्यते” – वाक्येऽस्मिन् त्रयः के सन्ति?
उत्तरम्— अस्मिन् वाक्ये त्रयः भवन्ति— माता, पिता, आचार्य: च।
(घ) अस्माभिः कीदृशं कर्म कर्तव्यम्?
उत्तरम्— येन अस्माकम् अन्तरात्मनः परितोषः स्यात् तादृशं कर्म अस्माभिः कर्तव्यम्।
(ङ) अभिवादनशीलस्य कानि वर्धन्ते?
उत्तरम्— अभिवादनशीलस्य आयुः विद्या यशः बलं च वर्धन्ते।
(च) सर्वदा केषां प्रियं कुर्यात्?
उत्तरम्— सर्वदा पितरोः आचार्यस्य च प्रियं कुर्यात्।
प्रश्न:—3. स्थूलपदान्यवलम्बय प्रश्ननिर्माणं कुरुत (मोटे पदों की सहायता से प्रश्न निर्माण कीजिए)—
(क) वृद्धोपसेविनः आयुविर्द्या यशो बलं च वर्धन्ते।
(ख) मनुष्यः सत्यपूतां वाचं वदेत्।
(ग) त्रिषु तुष्टेषु सर्वं तपः समाप्यते?
(घ) मातापितरौ नृणां सम्भवे भाषया क्लेशं सहेते।
(ङ) तयोः नित्यं प्रियं कुर्यात्।
उत्तराणि—
(क) कस्य आयुर्विद्या यशो बलं च वर्धन्ते।
(ख) मनुष्यः कीदृशीं वाचं वदेत्?
(ग) त्रिषु तुष्टेषु किं / क: समाप्यते?
(घ) कौ नृणां सम्भवे भाषया क्लेशं सहेते?
(ङ) तयोः नित्यं किं कुर्यात्?
प्रश्न:—4. अधोलिखितानां शब्दानां संस्कृतभाषायां वाक्यप्रयोगं कुरुत–
निम्नलिखित शब्दों का प्रयोग करके संस्कृतभाषा में वाक्य बनाइए –
(क) विद्या
(ख) तपः
(ग) समाचरेत्
(घ) परितोष:
(ङ) नित्यम्
उत्तराणि—
(क) विद्या – विद्या विनयं ददाति।
(ख) तपः – अध्ययनम् अपि तप: भवति।
(ग) समाचरेत् – नित्यम् उचितम् समाचरेत्।
(घ) परितोषः – छात्रस्य सफलतायां गुरो: सन्तोषः सञ्जायते।
(ङ) नित्यम् – नित्यं संस्कृतं पठत।
प्रश्न:—5. शुद्धवाक्यानां समक्षम् आम् अशुद्धवाक्यानां समक्षं च नैव इति लिखत–
शुद्धवाक्यों के सामने ‘आम्’ और अशुद्धवाक्यों के सामने ‘न’ लिखिए—
(क) अभिवादनशीलस्य किमपि न वर्धते। उत्तरम्— न
(ख) मातापितरौ नृणां सम्भवे कष्टं सहेते। उत्तरम्— आम्
(ग) आत्मवशं तु सर्वमेव दुःखमस्ति। उत्तरम्— न
(घ) येन पितरौ आचार्यः च सन्तुष्टाः तस्य सर्वं तपः समाप्यते। उत्तरम्— आम्
(ङ) मनुष्यः सदैव मनः पूतं समाचरेत्। उत्तरम्— आम्
(च) मनुष्यः सदैव तदेव कर्म कुर्यात् येनान्तरात्मा तुष्यते। उत्तरम्— आम्
प्रश्न:—6. समुचितपदेन रिक्तस्थानानि पूरयत (उचित पद से रिक्त स्थान भरिए) –
(क) मातापित्रे: तपसः निष्कृतिः ……………. कर्तुमशक्या। (दशवर्षैरपि/षष्टिः वर्षैरपि/वर्षशतैरपि)।
(ख) नित्यं वृद्धोपसेविनः ……………. वर्धन्ते (चत्वारि/पञ्च/षट्)।
(ग) त्रिषु तुष्टेषु ……………. सर्वं समाप्यते (जपः/तप/कर्म)।
(घ) एतत् विद्यात् ……………. लक्षणं सुखदुःपयोः। (शरीरेण!समासेन/विस्तारेण)
(ङ) दृष्टिपूतम् न्यसेत् …………….। (हस्तम्/पादम्/मुखम्)
(च) मनुष्यः मातापित्रो: आचार्यस्यय च सर्वदा ……….. कुर्यात्। (प्रियम्/अप्रियम्/अकार्यम्)
उत्तराणि—
(क) मातापित्रे: तपसः निष्कृतिः …… वर्षशतैरपि ….. कर्तुमशक्या।
(ख) नित्यं वृद्धोपसेविनः …… चत्वारि…. वर्धन्ते।
(ग) त्रिषु तुष्टेषु …. तप:… सर्वं समाप्यते।
(घ) एतत् विद्यात् …. तप:…. लक्षणं सुखदुःपयोः।
(ङ) दृष्टिपूतम् न्यसेत् …. पादम्…।
(च) मनुष्यः मातापित्रो: आचार्यस्यय च सर्वदा … प्रियम्…. कुर्यात्।
प्रश्न:—7. मञ्जूषातः चित्वा उचिताव्ययेन वाक्यपूर्ति कुरुत–
मञ्जूषा से चुनकर उचित अव्ययवों से वाक्य को पूरा कीजिए—
| तावत् | अपि | एव | यथा | नित्यं | यादृशम् |
(क) तयोः ………… प्रियं कुर्यात्।
(ख) ………… कर्म करिष्यसि। तादृशं फलं प्राप्स्यसि।
(ग) वर्षशतैः ………… निष्कृतिः न कर्तुं शक्या।
(घ) तेषु ………… त्रिषु तुष्टेषु तपः समाप्यते।
(ङ) ………… राजा तथा प्रजा
(च) यावत् सफलः न भवति ………… परिश्रमं कुरु।
उत्तराणि—
(क) तयोः …. नित्यम् ….. प्रियं कुर्यात्।
(ख) …. यादृशम् …….. कर्म करिष्यसि। तादृशं फलं प्राप्स्यसि।
(ग) वर्षशतैः …. अपि …….. निष्कृतिः न कर्तुं शक्या।
(घ) तेषु …. एव …….. त्रिषु तुष्टेषु तपः समाप्यते।
(ङ) ….. यथा ……. राजा तथा प्रजा
(च) यावत् सफलः न भवति ….. तावत् ……. परिश्रमं कुरु।
टिप्पणी— यह अध्याय एन. सी.आर.टी. द्वारा कक्षा-8 के लिए निर्धारित संस्कृत की पाठ्य पुस्तक रुचिरा भाग—3 से लिया गया है।
